Wednesday, May 21, 2008

सुबह-सुबह के रस्ते पे...


सुबह-सुबह के रस्ते पे,
कुछ ख़त डाल के बस्ते में…
चलते हैं दो साए से,
कभी दाएँ से कभी बाएँ से,

शाखों में लाल सा गोटा टाँक,
पेड़ों की मुड़ेरों से झाँक.
पत्तों से धूप जब छनती है,
एक तस्वीर धुंध की बनती है.

फिर सूरज सीढी चढ़ता है,
दिन भी कुछ आगे बढ़ता है.
कुछ वक्त के हिस्से होते हैं,
दिन के दसियों किस्से होते हैं.

कुछ के दाम नही होते,
कुछ की नीलामी सस्ते में.
सुबह-सुबह के रस्ते पे,
कुछ ख़त डाल के बस्ते में…

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