Thursday, May 22, 2008

ये रात बहुत लम्बी है आज...



ये रात बहुत लम्बी है आज,
ये ख़त मैं नही आएगी।
खुल गया लिफाफा गर कहीं
यह दिन पे भी गिर जायेगी...

ख़त में लिख इसे,
मैंने संग मोड़ा था.
कभी समेट कर,
एक नज्म में जोड़ा था.

भूल गया था,
चाँद का टिकट लगाना.
देखना आज फिर ये,
बैरंग लौट आएगी...

ये रात बहुत लम्बी है आज...

बहुत ज़ोर लगाया,
की ये जान का झमेला जाए.
तुम भी हाथ दो ज़रा,
तो इसको कुछ धकेला जाए.

तुम से डरती है ये,
तुम से ही घबराती है।
देखना तुम्हे देखते ही,
फिर से ये छिप जायेगी...

ये रात बहुत लम्बी है आज...

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