ये पहर भी बीत गया...
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कदम तुम्हारे पड़े नहीं…
चौखट राह तकती रही,
कोई पाँव इधर बड़े नहीं.
सुबह दोपहर अब शाम हुई,
सब फिर से तुम्हारे नाम हुई.
पाये दान भी ये कहता रहा,
हुए कब से तुम यहाँ खड़े नहीं…
ये पहर भी बीत गया,
कदम तुम्हारे पड़े नहीं…
भूल गयीं भीड़ में तुम शायद ये कोना,
मिली जुली बातों से सिला हुआ बिछौना.
इस दिन के ज़ेवर पर,
अब तक रंग तुम्हारे चड़े नहीं…
ये पहर भी बीत गया,
कदम तुम्हारे पड़े नहीं…


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