Thursday, May 22, 2008

धूप की बारिश में...

धूप की बारिश में
कल तुम नहा रहीं थी,
सीदिया चढ़ते चढ़ते
कुछ गुनगुना रहीं थी…

फैली थीं तुम्हारे आसपास मुस्कुराहटें,
कुछ कह रहीं थी तुम्हारी आहटें.
देखा था छत से मैंने तुम्हें,
तुम खुद से ही कुछ बतिया रही थी…

धूप की बारिश में
कल तुम नहा रहीं थी…

मानो दिन ही में चांदनी थी खिली,
या रेशम से कहानी कोई सिली।

सूरज शरमा कर नीचे जा रहा था,
ज़िंदगी जो सीढ़ियों से ऊपर आ रही थी…

धूप की बारिश में
कल तुम नहा रहीं थी…

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