शाम अब रही कहाँ...
शाम अब रही कहाँशाम कहीं चली गई अंधेरे की लाडली सपने सी वो सांवली गई खुशबू भरी बातें वो मुझे छू गयीं सौगातें जो मीठी मीठी बातों की मिश्री की वो डली गई शाम अब रही कहाँ शाम कहीं चली गई वो जो जगाये मुझे जिंदा हूँ बताएं मुझे साँसों की वो लड़ी थी जो मिली गई शाम अब रही कहाँ शाम कहीं चली गई हर बात जिस से थी मिली मेरे हर सपने में थी जो पली जाने कौन से धागे से हर बात मेरी सिली गई शाम अब रही कहाँ शाम कहीं चली गयी |
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