Sunday, June 22, 2008

भीगी भीगी सुबह...

भीगी भीगी सुबह,
रंग तेरा लिए…
तू चली आती है,
रोज़ सवेरा लिए.

यूँ तो होते हैं बादल आसमानी,
लिखते फिरते हैं हवाओं पे कहानी.
तेरे संग हर दिन आता है,
एक पन्ना सुनहरा लिए…

भीगी भीगी सुबह,
रंग तेरा लिए…

तेरी आंखों में ज़रा झाँक लूँ मैं,
तेरे आसमान पर एक सितारा टांक दूँ मैं.
तेरे बिना तो दिन आता है,
जैसे अँधेरा लिए…

भीगी भीगी सुबह,
रंग तेरा लिए…

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शाम अब रही कहाँ...

शाम अब रही कहाँ
शाम कहीं चली गई
अंधेरे की लाडली
सपने सी वो सांवली गई

खुशबू भरी बातें वो
मुझे छू गयीं सौगातें जो
मीठी मीठी बातों की
मिश्री की वो डली गई

शाम अब रही कहाँ
शाम कहीं चली गई

वो जो जगाये मुझे
जिंदा हूँ बताएं मुझे
साँसों की वो लड़ी
थी जो मिली गई

शाम अब रही कहाँ
शाम कहीं चली गई

हर बात जिस से थी मिली
मेरे हर सपने में थी जो पली
जाने कौन से धागे से
हर बात मेरी सिली गई

शाम अब रही कहाँ
शाम कहीं चली गयी

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