Sunday, June 22, 2008

फिर शाम पर तेरे रंग चढ़े...

फिर शाम पर तेरे रंग चढ़े,
फिर ख्वाब मेरे जिद पे अड़े…

हवा कान में कुछ कह गई,
तेरी महक मेरे संग रह गई.
तेरी मेज़ पर कहीं मेरे,
फूल रह गए पड़े…

फिर शाम पर तेरे रंग चढ़े,
फिर ख्वाब मेरे जिद पे अड़े…

सांसें चले तो कहे ये मन,
मन में बसी है तेरी छुअन.
याद नहीं जाने कब,
मेरे रंग तुझसे जा जुड़े…

फिर शाम पर तेरे रंग चढ़े,
फिर ख्वाब मेरे जिद पे अड़े…

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1 Comments:

Anonymous Anonymous said...

hello... hapi blogging... have a nice day! just visiting here....

April 20, 2009 at 8:30 AM  

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