रात बहुत छोटी थी...
रात बहुत छोटी थी,पर रात बहुत संभाली मैंने…
छोटे छोटे चाँद बना कर,
रात गुल्लक में डाली मैंने.
जुगनू सारे अपने थे,
मेरे ही वो सपने थे.
अपने नहीं दिखे कहीं,
तो तारों की आदत डाली मैंने…
रात बहुत छोटी थी,
पर रात बहुत संभाली मैंने…
मांगी कितनी मन्नतें मैंने,
ढूँढी कितनी जन्नतें मैंने.
सात जनम तक न मिली जो,
तेरी एक नज़र में पाली मैंने…
रात बहुत छोटी थी,
पर रात बहुत संभाली मैंने…


0 Comments:
Post a Comment
Subscribe to Post Comments [Atom]
<< Home